Ahmedabad, Gujarat, Mar 29, इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एस. सोमनाथ ने आज आईआईएमए के 60वें दीक्षांत समारोह में 630 स्नातक छात्रों को संबोधित करते हुए कहा नवाचार की भावना विकसित करें और वास्तविक दुनिया की समस्याओं को हल करने के लिए अपने ज्ञान को लागू करें।
भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद ( आईआईएमए) ने आज संस्थान के प्रतिष्ठित लुइस काहन प्लाजा में अपना 60वाँ दीक्षांत समारोह आयोजित किया। डॉ. एस सोमनाथ, डॉ. विक्रम साराभाई प्रतिष्ठित प्रोफेसर तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष, मुख्य अतिथि के रूप में इस अवसर पर उपस्थित रहे। उनके साथ मंच पर पंकज पटेल, अध्यक्ष, शासी मंडल; आईआईएमए के निदेशक प्रोफेसर भारत भास्कर और संस्थान के संकाय सदस्य भी मौजूद थे।
दीक्षांत शोभायात्रा का नेतृत्व डीन (कार्यक्रम) प्रोफेसर दीप्तेश घोष ने किया, साथ ही प्रबंधन में डॉक्टरेट कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रोफेसर संदीप चक्रवर्ती भी उपस्थित थे। उनके बाद सभी कार्यक्रमों के अध्यक्ष, संकाय सदस्य और स्नातक छात्र शामिल थे। समारोह की शुरुआत आईआईएमए के शासी मंडल के अध्यक्ष द्वारा दीक्षांत समारोह को प्रारंभ करने की घोषणा के साथ हुई।
60वें दीक्षांत समारोह में चार पाठ्यक्रमों के 630 युवा लीडर के लिए यह एक गौरव का क्षण था, क्योंकि उन्हें औपचारिक रूप से उनकी डिग्री प्रदान की गई। इसमें प्रबंधन में डॉक्टरेट पाठ्यक्रम (पीएचडी) के 22 डॉक्टर, प्रबंधन में दो वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम (एमबीए-पीजीपी) के 405 छात्र, खाद्य एवं कृषि-व्यवसाय प्रबंधन में दो वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम (एमबीए-एफएबीएम) के 45 छात्र और प्रबंधन में एक वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम (एमबीए-पीजीपीएक्स) के 158 छात्र शामिल थे। डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों के परिवार के सदस्य और आईआईएमए के पूर्व छात्र भी डिग्री प्राप्तकर्ताओं का उत्साहवर्धन करने के लिए कार्यक्रम में उपस्थित थे।
मुख्य अतिथि द्वारा पाँच छात्रों को उनकी उत्कृष्ट शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए स्वर्ण पदक प्रदान किए गए। इनमें एमबीए-पीजीपी से अभि बंसल, ईशान जैन और आंचल चड्ढा, एमबीए-एफएबीएम से योगेश कुमार आर, और एमबीए-पीजीपीएक्स से आश्रुत रंगराजन शामिल थे।
आईआईएमए के शासी मंडल के अध्यक्ष श्री पंकज पटेल ने स्नातक छात्रों को डिग्री प्रदान की। अपने स्वागत भाषण में, श्री पंकज पटेल ने तेजी से बदलती व्यावसायिक दुनिया में आगे बढ़ने के लिए लचीले बने रहने और अपने कौशल को लगातार उन्नत करने के महत्व पर जोर दिया। “तेजी से तकनीकी प्रगति और डेटा-संचालित निर्णय लेने के साथ, व्यवसाय लगातार विकसित हो रहे हैं। ऐसे व्यावसायियों की मांग बढ़ रही है जो नवीनतम रुझानों के साथ तालमेल बिठा सकें। परिस्थितियों के अनुकूल ढलने, बदलाव को अपनाने और नए कौशल सीखने की आपकी क्षमता आपकी सबसे बड़ी ताकत होगी और आपको भीड़ में अलग बनाएगी,” उन्होंने कहा।
स्नातक छात्रों को नए भारत के लिए परिवर्तनकर्ता बनने के लिए प्रोत्साहित करते हुए, श्री पंकज पटेल ने कहा, “सिर्फ़ दो दशक बाकी है जब, भारत अपनी आज़ादी के 100वें वर्ष में प्रवेश करेगा। हम विकसित भारत 2047 को एक वास्तविकता बनाएँगे। भारत को आपकी ऊर्जा, आशावाद और कल्पना की ज़रूरत है। आप में से हर कोई जो आज आगे बढ़ रहा है, इस नए भारत का निर्माता होगा। व्यवसाय के लीडर के रूप में, यह सुनिश्चित करें कि आपकी रणनीतियाँ और निर्णय समावेशी हों और पिरामिड के निचले हिस्से में रहने वालों के लिए लाभ पैदा करें, जिससे वे भारत की विकास कहानी का हिस्सा बन सकें।”
स्नातक हो रहे छात्रों को अपने प्रेरक दीक्षांत भाषण में, इसरो के डॉ. विक्रम साराभाई प्रतिष्ठित प्रोफेसर, डॉ. एस. सोमनाथ ने उन प्रमुख विशेषताओं पर – व्यक्तिगत और व्यावसायी दोनों स्तरों पर – प्रकाश डाला जो उनकी सफलता को निर्धारित कर सकती हैं और कहा, “आपके पास जुनून होना चाहिए: आप जो करते हैं, उसके प्रति पूरी तरह समर्पित होना। प्रतिबद्धता होनी चाहिए: सभी प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रथम पंक्ति से नेतृत्व करना। उत्कृष्टता होनी चाहिए : व्यावसायी अखंडता और प्रदर्शन के उच्चतम मानकों को स्थापित करना। दृढ़ संकल्प होना चाहिए: आप कभी-कभी असफल हो सकते हैं, लेकिन कभी भी उत्साह नहीं खोना चाहिए। फोकस रखना: हमेशा बड़े सपने देखें, और छोटी चीजों से विचलित न हों। सीखने की क्षमता : आपको जीवन भर एक छात्र बने रहने की आवश्यकता है। सबसे बढ़कर, विनम्रता, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा रखनी चाहिए।”
अपने ज्ञान और जीवन के कुछ सबक छात्रों के साथ साझा करते हुए उन्होंने उन्हें सलाह दी कि वे जितना हो सके उतना पढ़ें, टीम में काम करना सीखें, निरंतर सीखने की आदत डालें, एक अच्छा लीडर बनने के लिए सही गुरु को खोजें और उसका अनुसरण करें और जीवन में जोखिम उठाएँ। छात्रों से नवाचार की भावना विकसित करने का आग्रह करते हुए डॉ. सोमनाथ ने कहा, “हमारे देश की क्षमता को सही मायने में उजागर करने के लिए, हमें नवाचार और सहयोग करना जारी रखना चाहिए। नवाचार के लिए जिज्ञासा की संस्कृति, असफलता का सामना करने की ताकत और जवाब खोजने की अदम्य भूख की आवश्यकता होती है। इसरो में, हमने इतने वर्षों में कई चुनौतियों का सामना किया, लेकिन प्रत्येक विफलता ने फिर से प्रयास करने, बल्कि बेहतर समाधान खोजने और अधिक ऊँचाइयों तक पहुँचने के हमारे संकल्प को मजबूत किया। भारत अब एक तकनीकी और वैज्ञानिक क्रांति के मुहाने पर है। भविष्य में अपार संभावनाएँ हैं- अंतरिक्ष अन्वेषण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सतत विकास और उससे भी आगे बहुत कुछ। उस भविष्य को आकार देने की जिम्मेदारी आपके हाथों में है। मैं आपसे नवाचार की भावना विकसित करने और अपने ज्ञान को वास्तविक दुनिया की समस्याओं को हल करने के लिए लागू करने का आग्रह करता हूँ, चाहे वह विज्ञान, मानविकी या सामाजिक विज्ञान ही क्यों ना हो, क्योंकि नवाचार हर जगह किया जा सकता है।”
समापन भाषण देते हुए, आईआईएमए के निदेशक प्रोफेसर भारत भास्कर ने पिछले एक साल के दौरान संस्थान की गतिविधियों और उपलब्धियों की मुख्य झलकियाँ साझा कीं। उन्होंने यह भी घोषणा की कि आईआईएमए पहला ऐसा आईआईएम है जो दुबई में एक अंतरराष्ट्रीय परिसर स्थापित करेगा, और उसका पहला पाठ्यक्रम सितंबर 2025 में शुरू किया जाएगा। प्रोफेसर भास्कर ने एक नए ‘मदन मोहनका केस पद्धति शिक्षा उत्कृष्टता केंद्र’ की स्थापना की भी घोषणा की, जिसे प्रमुख उद्योगपति और आईआईएमए के पीजीपी 1967 के पूर्व छात्र एम. मदन मोहनका द्वारा समर्थित किया जाएगा।
प्रोफेसर भास्कर ने विदा हो रहे स्नातक छात्रों को ईमानदारी से नेतृत्व करने और उत्कृष्टता के लिए प्रयास करने के लिए प्रेरित करते हुए कहा, “आज आपने जो डिग्री प्राप्त की है, वह ज्ञान, कौशल और आपके द्वारा यहाँ बनाए गए अमूल्य संबंधों पर आधारित एक नींव है। आगे की चुनौतियाँ जटिल होंगी, प्रतिस्पर्धा कड़ी होगी, लेकिन आपमें से प्रत्येक के भीतर नवाचार करने, ईमानदारी से नेतृत्व करने और सार्थक प्रभाव डालने की क्षमता निहित है। अनिश्चितता को स्वीकार करें, हर अनुभव से सीखें और उत्कृष्टता के लिए प्रयास करना कभी न छोड़ें। यह विश्व आपके योगदान का इंतजार कर रहा है।”
इस कार्यक्रम को और भी खास बनाते हुए, 1966 में स्नातक करने वाले आईआईएमए के पहले बैच के कुछ पूर्व छात्र भी दीक्षांत समारोह में उपस्थित रहे थे।
