~Parimal Nathwani highlights Gujarat’s rich Sanskrit education heritage and calls for revitalising Brihad Gujarat Sanskrit Parishad through government support, digital learning and modern educational collaboration.
Ahmedabad, Gujarat, Oct 16 (VNI): राज्यसभा सांसद, बृहद् गुजरात संस्कृत परिषद के कुलपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज के निदेशक (कॉर्पोरेट अफेयर्स) परिमल नथवाणी ने कहा है कि गुजरात में संस्कृत के अध्ययन और अध्यापन की समृद्ध एवं गौरवशाली परंपरा रही है। उन्होंने इस परंपरा को संरक्षित करने के साथ आधुनिक शैक्षिक अवसरों से जोड़ने और संस्कृत शिक्षा के लिए सुलभ, सुदृढ़ तथा समकालीन शैक्षिक परिवेश विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
श्री नथवाणी ने शुक्रवार को यहां जारी बयान में कहा कि इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली संस्थाओं में श्री बृहद् गुजरात संस्कृत परिषद का विशेष स्थान है। पारंपरिक संस्कृत शिक्षा को प्रोत्साहित करने, संस्कृत पाठशालाओं के विद्यार्थियों की सहायता करने और विद्यालयों में संस्कृत के अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न करने के उद्देश्य से वर्ष 1946 में इस संस्था की स्थापना की गई थी। परिषद का इतिहास इस बात का उदाहरण है कि स्वैच्छिक संस्थाएं किसी शैक्षिक आंदोलन के विकास में किस प्रकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

परिषद ने संस्कृत की श्रेणीबद्ध परीक्षाओं की व्यवस्था विकसित की, जिससे विद्यार्थियों को नियमित शिक्षा के साथ संस्कृत का व्यवस्थित अध्ययन करने के अवसर मिले। इसकी परीक्षा प्रणाली विद्यालयों, महाविद्यालयों, पाठशालाओं और अन्य शैक्षिक संस्थानों को जोड़ती थी। इससे पारंपरिक संस्कृत शिक्षा और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के बीच सेतु स्थापित करने में सहायता मिली। परिषद ने व्याख्यानों, संगोष्ठियों, वक्तृत्व एवं निबंध प्रतियोगिताओं, वैदिक मंत्रों और भगवद्गीता के पाठ, संस्कृत नाटकों, कहानी-कथन, श्लोक-गान सहित विभिन्न गतिविधियों का आयोजन भी किया। इसका उद्देश्य संस्कृत को केवल पाठ्यपुस्तकों और परीक्षाओं तक सीमित रखने के बजाय अभिव्यक्ति, साहित्य, दर्शन और सांस्कृतिक सृजनशीलता की जीवंत भाषा के रूप में प्रोत्साहित करना था।
श्री नथवाणी ने परिषद के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख करते हुए बताया कि गुजरात सरकार ने 19 अक्टूबर, 1985 को एक संकल्प के माध्यम से परिषद की कुछ निर्धारित परीक्षा योग्यताओं को आधुनिक शिक्षा की संबंधित योग्यताओं के समकक्ष मान्यता दी थी। इनमें प्रथमा को एसएससी, मध्यमा को एचएससी, शास्त्री को स्नातक, आचार्य को स्नातकोत्तर तथा शिक्षाशास्त्री को बीएड के समकक्ष माना गया था। हालांकि, बाद में इस व्यवस्था को निरस्त कर दिया गया था।
उन्होंने कहा कि गुजरात सरकार की ओर से उचित सहयोग और नैतिक प्रोत्साहन मिलने से राज्य में संस्कृत शिक्षा को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया जा सकता है। परिषद की प्रमुख आवश्यकता मान्यता प्राप्त करना है। परिषद चाहती है कि राज्य सरकार विद्यालयों को अपनी परीक्षाओं में अधिक से अधिक विद्यार्थियों को शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने के निर्देश दे, जिससे संस्कृत के अध्ययन का दायरा बढ़ सके।
परिषद की स्थापना के बाद से गुजरात में संस्कृत शिक्षा का परिदृश्य काफी विकसित हुआ है। वर्तमान में गुजरात राज्य संस्कृत बोर्ड, श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, विभिन्न विश्वविद्यालयों के संस्कृत विभाग, पारंपरिक पाठशालाएं, गुरुकुल तथा शिक्षण एवं अनुसंधान से जुड़ी अन्य संस्थाएं इस क्षेत्र में कार्यरत हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 भी संस्कृत सहित भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाने के लिए महत्वपूर्ण नीतिगत आधार प्रदान करती है। इन संस्थागत और नीतिगत अवसरों के माध्यम से संस्कृत शिक्षा को विद्यार्थियों, शिक्षकों और भाषा में रुचि रखने वाले अन्य लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाया जा सकता है।

श्री नथवाणी ने कहा कि गुजरात में संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में कभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली बृहद् गुजरात संस्कृत परिषद को पुनर्जीवित करने और राज्य की समकालीन शिक्षा व्यवस्था से अधिक निकटता से जोड़ने की आवश्यकता है। परिषद आज भी विद्यार्थियों को संस्कृत भाषा से रोचक ढंग से परिचित कराने और ज्ञान के भंडार के रूप में प्रतिष्ठित देवभाषा संस्कृत के प्रति उत्सुकता जगाने के लिए प्रयासरत है। बोलचाल की संस्कृत, कहानी-कथन, नाटक, संगीत, श्लोक-पाठ और संस्कृत गरबा जैसी गतिविधियों के माध्यम से भाषा सीखने की प्रक्रिया को अधिक सहभागी, रोचक और जीवंत बनाया जा सकता है।
उन्होंने संस्कृत शिक्षा के विस्तार में डिजिटल माध्यमों की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला। उनके अनुसार, शैक्षिक सामग्री, प्रकाशनों और ऐतिहासिक अभिलेखों का डिजिटलीकरण करने के साथ ऑनलाइन पाठ्यक्रमों और परीक्षा सुविधाओं का विकास किया जाए, तो परिषद अपनी मौजूदा पहुंच से आगे बढ़कर अधिक विद्यार्थियों तक पहुंच सकती है।
उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय संस्कृत शिक्षा से संबंधित उपयुक्त योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए परिषद की पात्रता पर विचार कर सकते हैं। श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय तथा अन्य मान्यता प्राप्त संस्थानों के साथ परिषद का शैक्षिक सहयोग स्थापित होने से पाठ्यक्रम विकास, शिक्षक प्रशिक्षण और मूल्यांकन के मानकों को सुदृढ़ किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में परिषद के स्वैच्छिक स्वरूप को भी बनाए रखा जा सकता है।

श्री नथवाणी ने कहा कि गुजरात के सामने मूल प्रश्न अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा को भविष्य की पीढ़ियों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का है। बृहद् गुजरात संस्कृत परिषद राज्य संस्कृत बोर्ड, विश्वविद्यालयों, विद्यालयों और पारंपरिक संस्थानों के साथ मिलकर विरासत तथा समकालीन शिक्षा के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बन सकती है। गुजरात के पास आवश्यक संस्थाएं, समृद्ध बौद्धिक परंपरा और अनुकूल नीतिगत अवसर उपलब्ध हैं। अब आवश्यकता एक समन्वित प्रयास की है, जो इन संसाधनों को संस्कृत शिक्षा के टिकाऊ, समावेशी और दूरदर्शी शैक्षिक परिवेश में परिवर्तित कर सके। VNI NEWS, Parimal Nathwani, Brihad Gujarat Sanskrit Parishad, Sanskrit Education Gujarat, Sanskrit Learning, Gujarat Sanskrit Board, Somnath Sanskrit University, National Education Policy 2020, Sanskrit Schools, Sanskrit Heritage, Gujarat Education News,
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